गुरुवार, 23 अप्रैल 2015

रंजन भैया तुमसे मिल कर

रंजन भैया तुमसे मिलकर
मिला बहुत कुछ जाने अनजाने मे सब कुछ
जीवन का उल्लास मिला है

कविताई का सार मिला है
एक नई कविता को फिर से यह कोमल एहसास मिला है
रंजन भैया गीली माटी
रंजन भैया पक्का लोहा
उस किसान के आँगन जैसा
है, विस्तार पा चुका जिसका
पसरा है भूगोल जहां तक
भूखा है इतिहास उसी का
रंजन भैया की छाती में भरा हुआ है एक तिहाई
इस समुद्र मे प्रेम भरा है
इसमे छुपी हुई सच्चाई
इसमे गगरी कौन डुबोए
पनिहारिन इस तट पर आओ
रंजन भैया तुमसे मिलकर प्यास बुझेगी नहीं कभी अब
सावन प्यासा
भादों प्यासा
प्यासा है जीवन मानुष का
सुनो माधुरी भाभी तुम भी
प्यासा है यह बहुत भतीजा
तुम से मिल कर प्यार मिला है
तुमसे यह अभिमान मिला है
रंजन भैया मिलते रहना
कविता में तुम गुनते रहना
भनते रहना जीवन उनका
बुनते रहना सपने उनके
जिन पर यह संसार टिका है ।

© शैलेन्द्र कुमार शुक्ल 

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