रविवार, 31 जुलाई 2016

प्रेमचंद का लेखन तमगों का मोहताज नहीं

   

प्रेमचंद वैचारिक प्रतिबद्धता के लेखक थे। उनका लेखन समाज में व्याप्त रूढ़ियों और दोगलेपन की धज्जियां आज भी उड़ता है। वह स्वस्थ प्रगतिशील थे आज के बौद्धिक बीमार लेखकों को उनसे सीखना चाहिए। प्रेमचंद का लेखन पुरस्कारों या तमगों का मोहताज नहीं था, उन्होने अपने लेखन के लिए सजाएँ पाईं, उनकी किताबें जप्त हुईं, उन्हें जुर्माने झेलने पड़े। वह मनुष्यता के पक्षधर एक सच्चे लेखक थे। उन्हें भारत की जनता ने अपना लेखक माना। हिंदी में यह लोकप्रियता दूसरे लेखक हो नहीं मिली। आज के साहित्यिक को इस पर विचार करना चाहिए।
    वह सतत विचारशील लेखक थे। उन्होने साहित्य का मायर बदला था। वह लिखते हैं-“हम साहित्‍य को केवल मनोरंजन और विलासिता की वस्‍तु नहीं समझते। हमारी कसौटी पर वही साहित्‍य खरा उतरेगा, जिसमें उच्‍च चिन्‍तन हो, स्‍वाधीनता का भाव हो, सौन्‍दर्य का सार हो, सृजन की आत्‍मा हो, जीवन की सच्‍चाइयों का प्रकाश हो--- जो हममें गति और बेचैनी पैदा करे, सुलाये नहीं, क्‍योंकि अब और ज्‍यादा सोना मृत्‍यु का लक्षण है” आज जब हम प्रेमचंद की जयंती मना रहे हैं तो इस पर विचार होना चाहिए कि आज का हमारा साहित्य इस कसौटी पर कितना खरा उतरता है। आज ज्यादा तर साहित्यकार मठाधीशी शिकार हैं, जनता पर लिखना उनकी मजबूरी है, वह साहित्यिक गठजोड़ की राजनीति करते नजर आते हैं। पुरस्कारों के लिए दिन-रात ठेकेदारों के तलवे सहलाते हैं। वह जानते हैं लेखक की यश और किर्ति का आधार तमगे हैं जो सत्ता के दलालों से यारी कर के हासिल किए जा सकते हैं। दरअसल आज के ज़्यादातर लेखक दलालों की चाटुकारिता कर चरण वंदना करने में व्यस्त हैं उन्हें असल में जनता के सुख-दुखों की रत्ती भर भी परवाह नहीं।
    आज देश भर में प्रेमचंद की जयंती धूमधाम से मनाई जा रही है। हिंदी के मास्टर चित्र पर माल्यार्पण कर रहे हैं और साहित्यिक जन लड्डू खा रहे हैं। प्रेमचंद की दो चार कहानियों के नाम जो वह जानते हैं ज़ोर-शोर से ले रहे हैं और गोदान और कफन’ ‘गबन कर रहे हैं। उनको प्रेमचंद के विचारों से कोई लेना-देना नहीं। वह एक बार भी अपने मन में नहीं सोचते आखिर यह सब उन्होने क्यों लिखा और लिखते हुये इतने संघर्ष क्यों झेले। उनके लिए प्रेमचंद नहीं उनकी जयंती काम की चीज है। विश्वविद्यालय स्तर पर प्रेमचंद सेमिनार करने के सबसे सहज साधन है। उन पर अटकल-पच्चू लिख कर शोध-आलेख बहुत जल्दी तैयार हो जाता है। एपीआई बढ़ाने में प्रेमचंद बड़े काम की चीज हैं। गोदान और कफन पर रट्टा मारू विद्वान घंटा भर बोलने की आदत डाल चुके हैं। मतलब यहाँ भी प्रेमचंद कमाई का ही साधन बन कर रह गए हैं। उनकी विचारधार पर बहस करना और आज के साहित्य को उस कसौटी पर कसना उनके लिए बेमतलब की चीजें हैं।

    आज प्रेमचंद को समझना कुछ सचेतकों कि ज़िम्मेदारी है। अगर हम उन्हें एक प्रगतिशील परंपरा में खड़ा कर देखें और मूल्यांकन करे तो आज के समाज के हिंदी लेखकों, साहित्यिकों, मास्टरों को हम कहाँ पाते हैं, यह सोचने समझने का जरूरी तथ्य है।                                   

-Shailendra Kumar Shukla        

शनिवार, 6 फ़रवरी 2016

   


    


       विगुल गीत
भीम का भारत भीम की आहट
ओ मनुवादी दहशत खाओ !
भीम की दुनिया भीम की बगिया
हत्यारों कुछ तो शरमाओ ॥

जब चलती थी तब चलती थी
अब न चली है अब न चलेगी ।
सोई आंधी जाग चुकी है
पंडित जी अब आग बुझाओ ॥

एकलव्यों के कटे अगूंठे
आज हुए हैं सभी इकठ्ठे ।
सबको यहीं जवाब चाहिए
यह बुलंद आवाज उठाओ ॥

सुनो द्रोण बेहूदे बाभन
ठकुर सोहाती नहीं चलेगी।
रोहित के टूटे सपनो से

ओ दलितों अब बज्र बनाओ ॥

-शैलेन्द्र कुमार शुक्ल

शुक्रवार, 24 अप्रैल 2015



दिल्ली की रातें

दिल्ली की रातें
रात नहीं
दिन भी नहीं हो सकती दिल्ली की रातें
भोर जैसा इन रातों में कुछ भी नहीं
इन रातों का अंधेरा
यमुना पार खड़ा है
बरसों से एक नाव के इंतजार में
और नदी काली होती जाती है

ऐसी ही एक रात के दायरे में
कोठारी हॉस्टल के गेट पर
इंतजार में खड़ा है दिल्ली का पहला दोस्त
कुँवर नारायण की कविता प्रेम रोग के साथ
यह जानते हुये कि यह कविता का पुराना नाम है

दिल्ली की रातें
कविता का पुराना नाम
शहर का पहला दोस्त

जैसे पीछे बहुत कुछ भूल आया हूँ
इस शहर मे भूल जाने के लिए
दिल्ली की दो रातों के बीच ।      

                                     -शैलेन्द्र कुमार शुक्ल  

गुरुवार, 23 अप्रैल 2015

रंजन भैया तुमसे मिल कर

रंजन भैया तुमसे मिलकर
मिला बहुत कुछ जाने अनजाने मे सब कुछ
जीवन का उल्लास मिला है

कविताई का सार मिला है
एक नई कविता को फिर से यह कोमल एहसास मिला है
रंजन भैया गीली माटी
रंजन भैया पक्का लोहा
उस किसान के आँगन जैसा
है, विस्तार पा चुका जिसका
पसरा है भूगोल जहां तक
भूखा है इतिहास उसी का
रंजन भैया की छाती में भरा हुआ है एक तिहाई
इस समुद्र मे प्रेम भरा है
इसमे छुपी हुई सच्चाई
इसमे गगरी कौन डुबोए
पनिहारिन इस तट पर आओ
रंजन भैया तुमसे मिलकर प्यास बुझेगी नहीं कभी अब
सावन प्यासा
भादों प्यासा
प्यासा है जीवन मानुष का
सुनो माधुरी भाभी तुम भी
प्यासा है यह बहुत भतीजा
तुम से मिल कर प्यार मिला है
तुमसे यह अभिमान मिला है
रंजन भैया मिलते रहना
कविता में तुम गुनते रहना
भनते रहना जीवन उनका
बुनते रहना सपने उनके
जिन पर यह संसार टिका है ।

© शैलेन्द्र कुमार शुक्ल 

मंगलवार, 21 अप्रैल 2015

   तुम्हें खेलना नहीं आता

खिड़की पर आई है
एक छोटी चिड़िया
मुझे डाटने के लिए

कल पेड़ ने गिरा दिया
मेरे ऊपर एक पका हुआ फल
और हँसने लगा

एक लड़की जो निमकौड़िओं के गुच्छों से
पहनी है हार, नथ और पायलें
मेरे कंधे हिलाती हुई बोली
तुम्हें खेलना नहीं आता

मुंडेर पर घर की आया है
एक कौआ चिल्लाता हुआ
शायद कुछ कह रहा है माँ से

गाँव का सबसे बूढ़ा आदमी
खाँस रहा है खटिया पर
मांग रहा है एक लोटिया पानी मुझसे

शायद इस गाँव में मैं ही बचा हूँ अकेला
और सब शहर की तरफ देख रहें हैं
टकटकी लगाए
डरे हुये
सहमे हुये ।  
                       - शैलेन्द्र कुमार शुक्ल, 
                  टुनई काका

टुनई काका गाय-भैंस की चरवाही में
रखते थे मशगूल अपने आप को
खरिया-खुरपा,
बंदर-छाप तमाखू के साथ चूने की गोली
और बीड़ी-माचिस लुंगी की गुलेट मे रख कर
हार-पात घूमा करते थे टुनई काका
             लोग कहते थे बड़ा औगुनी है टुनइया !

जाड़े-पाले की ठंड में रात-रात जाग कर अपने
गेहूं-मटर के खेतों की सिचौनी करते थे टुनई काका
आधी रात में भी ट्यूवेल-बोर के 15 फीट
गहरे गड्ढे में पट्टा चढ़ाने पैठ जाते थे टुनई काका
             लोग कहते थे बड़ा हिम्मती है टुनइया !

‘बेला का गौना’, ‘उदल का ब्याह’, ‘माड़ौ की लड़ाई’
कजरी, चइता, सरिया, सोहर,और न जाने क्या-क्या गाते थे टुनई काका
मेला-मिसरिख में सलीमा और नौटंकी
रात-रात भर देखा करते थे टुनई काका
लेकिन भोर भये घर भाग आते थे टुनई काका
               दादा कहते थे बड़ा मिज़ाजी है टुनइया !

इस साल पहले सूखा फिर बाढ़ ने सब चौपट कर दिया
गाँव-घर में त्राहि-त्राहि मची है बड़े दुखी हैं टुनई काका
अब दिल्ली जा रहें हैं बनिज कमाने टुनई काका
आँसू भरी आँखों से गाँव की ओर मुड़-मुड़ कर देखते हैं टुनई काका
               लोग कहते हैं बेईमान नहीं है टुनइया !

                                    -शैलेन्द्र कुमार शुक्ल, ‘बया’ अक्तूबर-सितंबर 2014