मंगलवार, 21 अप्रैल 2015

   तुम्हें खेलना नहीं आता

खिड़की पर आई है
एक छोटी चिड़िया
मुझे डाटने के लिए

कल पेड़ ने गिरा दिया
मेरे ऊपर एक पका हुआ फल
और हँसने लगा

एक लड़की जो निमकौड़िओं के गुच्छों से
पहनी है हार, नथ और पायलें
मेरे कंधे हिलाती हुई बोली
तुम्हें खेलना नहीं आता

मुंडेर पर घर की आया है
एक कौआ चिल्लाता हुआ
शायद कुछ कह रहा है माँ से

गाँव का सबसे बूढ़ा आदमी
खाँस रहा है खटिया पर
मांग रहा है एक लोटिया पानी मुझसे

शायद इस गाँव में मैं ही बचा हूँ अकेला
और सब शहर की तरफ देख रहें हैं
टकटकी लगाए
डरे हुये
सहमे हुये ।  
                       - शैलेन्द्र कुमार शुक्ल, 

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