तुम्हें खेलना नहीं आता
खिड़की पर आई है
एक छोटी चिड़िया
मुझे डाटने के लिए
कल पेड़ ने गिरा दिया
मेरे ऊपर एक पका हुआ फल
और हँसने लगा
एक लड़की जो निमकौड़िओं के गुच्छों से
पहनी है हार, नथ और पायलें
मेरे कंधे हिलाती हुई बोली
तुम्हें खेलना नहीं आता
मुंडेर पर घर की आया है
एक कौआ चिल्लाता हुआ
शायद कुछ कह रहा है माँ से
गाँव का सबसे बूढ़ा आदमी
खाँस रहा है खटिया पर
मांग रहा है एक लोटिया पानी मुझसे
शायद इस गाँव में मैं ही बचा हूँ अकेला
और सब शहर की तरफ देख रहें हैं
टकटकी लगाए
डरे हुये
सहमे हुये ।
- शैलेन्द्र कुमार शुक्ल,
खिड़की पर आई है
एक छोटी चिड़िया
मुझे डाटने के लिए
कल पेड़ ने गिरा दिया
मेरे ऊपर एक पका हुआ फल
और हँसने लगा
एक लड़की जो निमकौड़िओं के गुच्छों से
पहनी है हार, नथ और पायलें
मेरे कंधे हिलाती हुई बोली
तुम्हें खेलना नहीं आता
मुंडेर पर घर की आया है
एक कौआ चिल्लाता हुआ
शायद कुछ कह रहा है माँ से
गाँव का सबसे बूढ़ा आदमी
खाँस रहा है खटिया पर
मांग रहा है एक लोटिया पानी मुझसे
शायद इस गाँव में मैं ही बचा हूँ अकेला
और सब शहर की तरफ देख रहें हैं
टकटकी लगाए
डरे हुये
सहमे हुये ।
- शैलेन्द्र कुमार शुक्ल,
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